Friday, December 12, 2008

अब सपने भी नहीं रहेंगे आपके अपने


अब सपने भी नहीं रहेंगे आपके अपने



यदि कोई कहे कि आप अपने मन में जो कुछ भी सोचेंगे वह हूबहू कंप्यूटर की स्क्रीन पर भी दिखेगी तो इसे आप मजाक ही समझेंगे, लेकिन निकट भविष्य में शायद ऐसा ही होने वाला है। यहां तक कि कंप्यूटर आपके सपने भी बयां कर देगा।

जापान के एक शोध दल ने बृहस्पतिवार को कहा कि उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे कि लोगों के दिमाग में चल रही हर चीज कंप्यूटर स्क्रीन पर दिख सकती है, चाहे सपने ही क्यों न हों।

एटीआर कंप्यूटेशनल न्यूरोसाइंस लैबोरेटरीज के शोधकर्ताओं ने अमेरिकी पत्रिका न्यूरान में प्रकाशित होने से पहले अपने अध्ययन के बारे में इस बात की जानकारी दी कि उन्होंने मानव मस्तिष्क से चित्रों को सीधे प्रदर्शित करने में सफलता हासिल की है।

हालांकि अभी तो वैज्ञानिक मस्तिष्क से साधारण चित्र बनाने में ही सफल रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि इस तकनीक को सपनों तथा लोगों के दिमाग में छिपी अन्य गोपनीय बातों को प्रदर्शित करने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

संस्थान ने एक बयान में कहा कि दुनिया में ऐसा पहली बार हुआ है जब लोगों के मस्तिष्क में जो कुछ भी चल रहा है, उसे देखा जा सके। इसमें कहा गया है कि इस तकनीक के इस्तेमाल के बाद सपनों के बारे में जानना भी संभव होगा।






Thursday, December 11, 2008

यही हाल रहा तो कैसे बचेगी वसुंधरा


यही हाल रहा तो कैसे बचेगी वसुंधरा




एक ओर जहां वित्तीय संकट से बदहाल दुनिया भर के लोग आर्थिक मंदी से बड़ा मुद्दा जलवायु परिवर्तन को मान रहे हैं, वहीं कई देश ऐसे हैं जो धरती को आग के गोले में तब्दील होने से बचाने के लिए पूरी इच्छाशक्ति केसाथ काम नहीं कर रहे हैं।

बुधवार को जर्मनवाच और क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क [कैन] द्वारा जारी क्लाइमेट चेंज परफार्मेंस इंडेक्स 2009 में इस बात का खुलासा किया गया है। जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मुद्दे पर गहरी नजर रखने वाली इन संस्थाओं द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में अपने प्रयासों के बूते स्वीडन सभी देशों से ऊपर है, जबकि इस दिशा में सबसे ज्यादा उदासीनता दिखाने के कारण सऊदी अरब सबसे निचली पायदान पर है।

57 देशों में जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए उठाए गए कदमों के आधार पर बनाई गई इस सूची में भारत 62.1 अंक के साथ सातवें पायदान पर है। जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दे से ढंग से निपटने में कोई भी देश अपनी पूरी ताकत से नहीं लड़ रहा है। इस कारण इस साल जारी इस सूची में शीर्ष के तीनों स्थान रिक्त हैं। 66.7 अंक के साथ सूची में स्वीडन चौथे स्थान पर है, जबकि सऊदी अरब सबसे नीचे 60वें पायदान पर है। जिन विकसित देशों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सबसे आगे रहना चाहिए, उनका भी प्रदर्शन निराशाजनक है। अमेरिका जैसा देश अपने लचर प्रदर्शन के चलते सबसे कम प्रयास करने वालों की सूची में 39.8 के स्कोर के तीसरे स्थान पर है। अगर अमेरिका ईमानदारी से प्रयास करे, तो दूसरे देशों के लिए नजीर भी बनेगा और उन पर दबाव भी बढ़ेगा।

जलवायु परिवर्तन से जूझने के प्रयासों के आधार पर बनाई गई इस सूची में 57 ऐसे देशों की तुलना की गई है, जो पूरी दुनिया का 90 फीसदी कार्बन उत्सर्जन करते हैं। इस सूची को तैयार करने में उत्सर्जन स्तर, उत्सर्जन ट्रेंड और जलवायु नीति जैसे 12 मानदंडों को आधार बनाया गया है।

सहज अभिनय के पर्याय थे दादा मुनि

सहज अभिनय के पर्याय थे दादा मुनि





दादा मुनि के नाम से मशहूर अशोक कुमार हिंदी फिल्मों के पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने सहज अभिनय की शुरूआत की तथा किस्मत, आशीर्वाद, बंदिनी, परिणीता, शौकीन जैसी तमाम फिल्मों में विभिन्न अंदाज वाले चरित्र निभाने के बावजूद अपने को कभी स्टार की छवि में कैद नहीं होने दिया।

अशोक कुमार ने जब फिल्म जगत में प्रवेश किया तो वह हिंदी फिल्मों का शैशवकाल था। उस दौर में अभिनय के नाम पर थियेटर खासकर पारसी थियेटर अभिनय का बोलबाला था। गायक को अपने गाने स्वयं गाने पड़ते थे। इन स्थितियों में अशोक कुमार ने संवाद अदायगी के नाम पर बिना चीखे-चिल्लाए और बिना भाव भंगिमा बिगाड़े सहज अभिनय पेश किया। उन्होंने अपने दौर की जबर्दस्त हिट फिल्म किस्मत में पहली बार एंटी हीरो का चरित्र निभाया। हालांकि यह फिल्म किसी दूसरे कारण से चर्चित रही। फिल्म के कई दृश्यों में अशोक कुमार सिगरेट पीते दिखाए गए और उनकी यह अदा उस दौर की युवा पीढ़ी को खूब भायी।

अशोक कुमार का फिल्म जगत में प्रवेश दरअसल अभिनय के कारण नहीं हुआ था। शुरूआत में वह प्रसिद्ध फिल्मकार हिमांशु राय के साथ फिल्म निर्माण के तकनीकी पहलू सीख रहे थे। इसी दौरान 1936 में जब हिमांशु राय ने उनसे जीवन नैया फिल्म में उस दौर की मशहूर अभिनेत्री देविका रानी के साथ अभिनय करने को कहा था तो अशोक कुमार शुरू में काफी हिचकिचाए, लेकिन बाद में उन्होंने इस फिल्म में काम किया। अशोक कुमार ने देविका रानी के साथ अछूत कन्या फिल्म में काम किया। यह फिल्म एक ब्राह्मण लड़के और एक ऐसी कन्या की प्रेम कथा है जिसे समाज में अछूत माना जाता है। सामाजिक संदेश वाली इस फिल्म में देविका रानी जैसी वरिष्ठ कलाकार की छाया में अशोक कुमार कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए, लेकिन उन्होंने यह संकेत अवश्य दे दिया कि वह अभिनय को काफी गंभीरता से ले रहे हैं। उन्होंने देविका रानी के साथ इज्जत, निर्मला और सावित्री फिल्मों में भी काम किया।

देविका रानी के बाद अशोक कुमार ने लीला चिटनीस के साथ काम किया और इस जोड़ी की कंगन, झूला और बंधन काफी लोकप्रिय फिल्में रहीं। सही मायनों में अशोक कुमार ने सफलता का मुंह किस्मत फिल्म के जरिए देखा। यह फिल्म कलकत्ता के थियेटर में लंबे समय तक लगी रही और इसने व्यावसायिक सफलता के नए आयाम गढ़े। इस फिल्म के जरिए अशोक कुमार ने नायक में राम की छवि आरोपित करने के चलन को तोड़ते हुए एंटी हीरो की धारा को खूबसूरती से पेश किया।

कोलकाता में 13 अक्टूबर 1911 जन्मे अशोक कुमार फिल्मों में क्या गए उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने फिल्मी दुनिया का रुख कर लिया। उनके दोनों छोटे भाइयों अनूप कुमार और अशोक कुमार ने अभिनय में हाथ आजमाया। हालांकि किशोर कुमार बाद में पा‌र्श्व गायक के रूप में ज्यादा विख्यात हुए अशोक, अनूप और किशोर की तिकड़ी ने कई फिल्मों में काम किया, जिसमें सर्वाधिक चर्चित फिल्म चलती का नाम गाड़ी है। अशोक कुमार की पुत्री प्रीति गांगुली और दामाद देवेन वर्मा भी फिल्मों में हास्य अभिनेता के रूप में आए।

अशोक कुमार ने आशीर्वाद फिल्म में जहां अभिनय के नए आयाम स्थापित किए, वहीं विक्टोरिया नंबर 203 और शौकीन जैसी फिल्मों में हास्य अभिनय करके दिखा दिया कि वह एक संपूर्ण अभिनेता हैं। आर्शीवाद फिल्म के लिए उन्हें श्रेष्ठ अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बहुमुखी अभिनय के कारण अशोक कुमार को 1988 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें कुछ फिल्मों के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। दादा मुनि का अभिनय सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था। उन्होंने टेलीविजन में भी अभिनय किया।

भारत के पहले सोप ओपेरा हम लोग में अशोक कुमार ने सूत्रधार की भूमिका की। इस भूमिका में अशोक कुमार कहानी के अलावा समसामयिक मुद्दों पर चुटीली टिप्पणी करते थे, जो दर्शकों द्वारा काफी पसंद की जाती थी। इसके अलावा उन्होंने बहादुर शाह जफर धारावाहिक में केंद्रीय भूमिका भी निभाई थी। अपने अंतिम दौर में जब डाक्टरों ने अशोक कुमार को बीमारी के कारण फिल्मों में काम करने से मना कर दिया था तो वह काफी दुखी हो गए थे। इस बहुमुखी अभिनेता का निधन 2001 में हुआ।

Wednesday, December 10, 2008

सहज अभिनय के पर्याय थे दादा मुनि

सहज अभिनय के पर्याय थे दादा मुनि



दादा मुनि के नाम से मशहूर अशोक कुमार हिंदी फिल्मों के पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने सहज अभिनय की शुरूआत की तथा किस्मत, आशीर्वाद, बंदिनी, परिणीता, शौकीन जैसी तमाम फिल्मों में विभिन्न अंदाज वाले चरित्र निभाने के बावजूद अपने को कभी स्टार की छवि में कैद नहीं होने दिया।

अशोक कुमार ने जब फिल्म जगत में प्रवेश किया तो वह हिंदी फिल्मों का शैशवकाल था। उस दौर में अभिनय के नाम पर थियेटर खासकर पारसी थियेटर अभिनय का बोलबाला था। गायक को अपने गाने स्वयं गाने पड़ते थे। इन स्थितियों में अशोक कुमार ने संवाद अदायगी के नाम पर बिना चीखे-चिल्लाए और बिना भाव भंगिमा बिगाड़े सहज अभिनय पेश किया। उन्होंने अपने दौर की जबर्दस्त हिट फिल्म किस्मत में पहली बार एंटी हीरो का चरित्र निभाया। हालांकि यह फिल्म किसी दूसरे कारण से चर्चित रही। फिल्म के कई दृश्यों में अशोक कुमार सिगरेट पीते दिखाए गए और उनकी यह अदा उस दौर की युवा पीढ़ी को खूब भायी।

अशोक कुमार का फिल्म जगत में प्रवेश दरअसल अभिनय के कारण नहीं हुआ था। शुरूआत में वह प्रसिद्ध फिल्मकार हिमांशु राय के साथ फिल्म निर्माण के तकनीकी पहलू सीख रहे थे। इसी दौरान 1936 में जब हिमांशु राय ने उनसे जीवन नैया फिल्म में उस दौर की मशहूर अभिनेत्री देविका रानी के साथ अभिनय करने को कहा था तो अशोक कुमार शुरू में काफी हिचकिचाए, लेकिन बाद में उन्होंने इस फिल्म में काम किया। अशोक कुमार ने देविका रानी के साथ अछूत कन्या फिल्म में काम किया। यह फिल्म एक ब्राह्मण लड़के और एक ऐसी कन्या की प्रेम कथा है जिसे समाज में अछूत माना जाता है। सामाजिक संदेश वाली इस फिल्म में देविका रानी जैसी वरिष्ठ कलाकार की छाया में अशोक कुमार कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए, लेकिन उन्होंने यह संकेत अवश्य दे दिया कि वह अभिनय को काफी गंभीरता से ले रहे हैं। उन्होंने देविका रानी के साथ इज्जत, निर्मला और सावित्री फिल्मों में भी काम किया।

देविका रानी के बाद अशोक कुमार ने लीला चिटनीस के साथ काम किया और इस जोड़ी की कंगन, झूला और बंधन काफी लोकप्रिय फिल्में रहीं। सही मायनों में अशोक कुमार ने सफलता का मुंह किस्मत फिल्म के जरिए देखा। यह फिल्म कलकत्ता के थियेटर में लंबे समय तक लगी रही और इसने व्यावसायिक सफलता के नए आयाम गढ़े। इस फिल्म के जरिए अशोक कुमार ने नायक में राम की छवि आरोपित करने के चलन को तोड़ते हुए एंटी हीरो की धारा को खूबसूरती से पेश किया।

कोलकाता में 13 अक्टूबर 1911 जन्मे अशोक कुमार फिल्मों में क्या गए उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने फिल्मी दुनिया का रुख कर लिया। उनके दोनों छोटे भाइयों अनूप कुमार और अशोक कुमार ने अभिनय में हाथ आजमाया। हालांकि किशोर कुमार बाद में पा‌र्श्व गायक के रूप में ज्यादा विख्यात हुए अशोक, अनूप और किशोर की तिकड़ी ने कई फिल्मों में काम किया, जिसमें सर्वाधिक चर्चित फिल्म चलती का नाम गाड़ी है। अशोक कुमार की पुत्री प्रीति गांगुली और दामाद देवेन वर्मा भी फिल्मों में हास्य अभिनेता के रूप में आए।

अशोक कुमार ने आशीर्वाद फिल्म में जहां अभिनय के नए आयाम स्थापित किए, वहीं विक्टोरिया नंबर 203 और शौकीन जैसी फिल्मों में हास्य अभिनय करके दिखा दिया कि वह एक संपूर्ण अभिनेता हैं। आर्शीवाद फिल्म के लिए उन्हें श्रेष्ठ अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बहुमुखी अभिनय के कारण अशोक कुमार को 1988 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें कुछ फिल्मों के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। दादा मुनि का अभिनय सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था। उन्होंने टेलीविजन में भी अभिनय किया।

भारत के पहले सोप ओपेरा हम लोग में अशोक कुमार ने सूत्रधार की भूमिका की। इस भूमिका में अशोक कुमार कहानी के अलावा समसामयिक मुद्दों पर चुटीली टिप्पणी करते थे, जो दर्शकों द्वारा काफी पसंद की जाती थी। इसके अलावा उन्होंने बहादुर शाह जफर धारावाहिक में केंद्रीय भूमिका भी निभाई थी। अपने अंतिम दौर में जब डाक्टरों ने अशोक कुमार को बीमारी के कारण फिल्मों में काम करने से मना कर दिया था तो वह काफी दुखी हो गए थे। इस बहुमुखी अभिनेता का निधन 2001 में हुआ।

Thursday, December 4, 2008

मुझे छुड़ाने की बजाय आतंकी को मार देना

मुझे छुड़ाने की बजाय आतंकी को मार देना





मुंबई पर हुए आतंकी हमलों से बालीवुड के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन, आमिर खान और शाहरुख खान काफी आहत हैं। इन दिग्गजों ने जनता के आक्रोश को जायज ठहराया है। अमिताभ ने जहां हमलों को लेकर उत्पन्न जनाक्रोश की तुलना एक ऐसे बांध से की है जो पूरी तरह से टूट गया है और उससे अनियंत्रित पानी लगातार बहता जा रहा है, वहीं आमिर खान का मानना है कि आतंकियों के साथ किसी तरह की सौदेबाजी नहीं की जानी चाहिए। साथ ही कहते हैं कि यदि मुझे आतंकी बंधक बना लें तो मुझे छुड़ाने के बजाय आतंकियों को मार देना, जबकि किंग खान शाहरुख का मानना है कि आतंकवाद को धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

अमिताभ ने अपने ब्लाग में लिखा है कि इन हमलों को लेकर देशवासी बहुत व्यथित और गुस्से में हैं। यह व्यथा और गुस्सा किसी न किसी रूप में लगातार जाहिर होता जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों और देश को चलाने वाले प्रशासन की जरूरत होती है। आज जो हालात हैं, उनमें राजनीतिज्ञों और प्रशासक दोनों के लिए ही उदासीनता का भाव है। हर जगह केवल सवाल उठ रहे हैं।

उन्होंने लिखा है कि विश्वास की कमी और फिर खीझ दिखाई दे रही है। खीझ का कारण विश्वास टूटना नहीं है। खीझ इसलिए है, क्योंकि समाधान देने वाला कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसा लगता है मानो बांध टूट चुका है और पानी अनियंत्रित होकर बहता जा रहा है।

..तो मर जाने देना मुझको

उधर, आमिर खान का मानना है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं और आतंकवाद केवल एके 47 से ही नहीं फैलाया जाता, बल्कि हर वह काम, जिससे आम आदमी के दिल में दहशत पैदा हो आतंक की श्रेणी में आता है और इसे रोकने के लिए जरूरी है कि आतंकियों से किसी की जान के बदले में कोई सौदा नहीं किया जाए।

आमिर ने अपने ब्लाग में लिखा है इस घटना से पहला सबक तो यह मिलता है कि हमें आतंकियों के साथ कोई सौदेबाजी नहीं करनी चाहिए। आतंकियों को यह स्पष्ट संदेश दिया जाए कि भारत आतंकियों से कोई समझौता वार्ता नहीं करेगा। इसका साफ मतलब है कि भविष्य में अगर कभी इस तरह के हालात बनते हैं कि मुझे और मेरे बच्चों को कुछ आतंकी बंधक बना लें तो मैं अपनी सरकार से यह कहने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहूंगा कि मेरे और मेरे बच्चों की परवाह न करें और देश के व्यापक हित में आतंकियों को मार गिराएं।

आमिर ने लिखा है कि कांग्रेस और भाजपा सरकारें आतंकवाद से निपटने में पूरी तरह से नाकाम रही हैं। मुंबई पर आतंकी हमले ने कांग्रेसनीत संप्रग की अक्षमता जाहिर कर दी, जबकि भाजपा शासनकाल में इंडियन एयरलाइंस के विमान अपहरण की घटना ने सरकार को लाचार बना दिया था।

आमिर के अनुसार विमान अपहरण की घटना में बंधकों को छुड़ाने के लिए राजग सरकार ने जिन्हें रिहा किया वह तीनों खतरनाक आतंकी और पांचों अपहरणकर्ता भारत को एक बार फिर निशाना बनाने की तैयारी करने लगे। इससे पहला सबक यही मिलता है कि हमें किसी भी हालत में आतंकियों से कोई सौदा नहीं करना चाहिए।

आमिर ने लिखा है कि संकट की घड़ी में हमें संयम बनाए रखना चाहिए। उन्होंने लिखा है कि उन्होंने टीवी पर किसी को यह कहते सुना कि विरोध स्वरूप हमें टैक्स अदा नहीं करना चाहिए। आमिर के अनुसार, इससे अधिक मूर्खतापूर्ण विचार मैंने कभी नहीं सुना। अगर हम टैक्स नहीं देंगे तो हमारे पास हमारी रक्षा के लिए सेना व एनएसजी कहां होंगे। हमें तो ईमानदारी से टैक्स देना चाहिए।

उन्होंने लिखा है कि हम नेताओं से तो बड़ी उम्मीदें करते हैं, लेकिन क्या हम अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं। अगर हम खुद भ्रष्ट हैं तो अपने राजनीतिज्ञों से ईमानदारी की उम्मीद क्यों। राजनीतिज्ञों पर आरोप लगाना ठीक नहीं है। वह किसी दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं। वह हममें से ही हैं। हममें से आधे लोग वोट देने नहीं जाते। केवल आधे लोग ही इन राजनीतिज्ञों को चुनते हैं।

आमिर ने लिखा है कि अगर हम सचमुच व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं तो पहले हमें खुद को बदलना होगा। हमें केवल अपने लाभ के बजाय सामूहिक लाभ के बारे में सोचना होगा। यह आत्मबलिदान का समय है। अगर हम ऐसा कर पाए तो हमारे बच्चों को बेहतर भविष्य मिल जाएगा।

उन्होंने लिखा है कि देश के युवाओं को आगे आ कर राजनीतिक दल बनाना होगा। यह वर्ग ईमानदार दृढ़ नेतृत्व देगा, जिसका हम सब समर्थन कर सकते हैं। हमें सुनिश्चित करना होगा कि आतंकी अपने इरादों में कामयाब न हों। उनका उद्देश्य नफरत फैलाना है। हम प्रेम और शांति से उनके इरादों पर पानी फेर सकते हैं। यह कमजोरी का नहीं, बल्कि शक्ति का संकेत है।

युवाओं को दी जाए सही जानकारी

बालीवुड के एक और दिग्गज सुपरस्टार शाहरुख खान ने 26 नवंबर के मुंबई के आतंकी हमले पर गहरा क्षोभ प्रकट करते हुए लोगों से धर्म को सांप्रदायिकता से अलग रखने की अपील की है।

शाहरुख ने बीबीसी एशियन नेटवर्क पर रेडिया शो कार्यक्रम में कहा कि एक मुसलमान होने के नाते मेरा मानना है कि युवावर्ग को इस्लाम को सही तरीके से समझने और उसकी इज्जत करने की जरूरत है। मैं मानता हूं कि किसी भी धर्म के साथ कोई एजेंडा नहीं जोड़ा जाना चाहिए। यह कार्यक्रम शनिवार को प्रसारित होगा।

मुंबई के आतंकी हमले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे बच्चे जिस धर्म के साथ पैदा होते हैं वह ऐसा हो जिसे भद्र आचरण के रूप में पालन किया जा सके और काम को एक अलग धर्म के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने अब तक इस भीषण हमले पर क्यों कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उन्होंने कहा कि मैंने अब तक इस घटना पर कोई टिप्पणी करने से अपने आप को दूर रखा क्योंकि इस तरह की स्थिति में बताने के लिए उनके पास कोई शब्द नहीं थे। हमारी भावना बस गुस्से, अविश्वास और दुख से भरी हुई है।

आतंकियों के सुपुर्दे खाक पर बटा बालीवुड

आतंकियों के सुपुर्दे खाक पर बटा बालीवुड





मुंबई पर हमला करने वाले आतंकियों के शवों के सुपुर्दे खाक को लेकर हर जगह की तरह बालीवुड में भी बहस छिड़ गई है। दरअसल, मुंबई के एक प्रमुख मुस्लिम संगठन ने आतंकियों के शवों को दफनाने से मना कर दिया है।

फिल्म निर्देशक फरहान अख्तर कहते है कि आतंकियों के शव पाकिस्तान भेज दिए जाने चाहिए, जबकि निर्देशक अनीस बज्मी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका मानना है कि मानवीय आधार पर इनको यहीं दफना देना चाहिए। निर्माता महेश भट्ट का कहना है कि आतंकियों के शवों के अंतिम संस्कार का मामला सेना पर छोड़ देना चाहिए।

उधर, अभिनेता इकबाल खान का कहना है कि ये आतंकी मुसलमान नहीं थे क्योंकि इन्होंने जो किया, इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता। इनके शवों को पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए।

Monday, December 1, 2008

मीडिया की भूमिका पर उठे सवाल

मीडिया की भूमिका पर उठे सवाल


वरिष्ठ पत्रकारों ने मुंबई पर आतंकी हमलों में इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका की आलोचना करते हुए इसे तत्वहीन और अपरिपक्व करार देते हुए कहा है कि टीवी खबरिया चैनलों ने ऐसी संवेदनशील घटना की रिपोर्टिग रियलिटी शो की तर्ज पर की है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने कहा कि टीवी खबरिया चैनलों पर पिछले तीन दिन से जिस प्रकार मुंबई आतंकी हमले जैसी संवेदनशील घटना की रिपोर्टिग देख रहे है वह तत्वहीन और बकवास से ज्यादा और कुछ भी नहीं। उन्होंने कहा कि उन रिपोर्टरों को यह पता ही नहीं है वहां क्या हो रहा है, समय की मांग क्या है और उनकी कथनी का क्या अर्थ सामने आ सकता है। टीवी चैनलों के रिपोर्टरों को ऐसी घटनाओं को पेश करने का कोई प्रशिक्षण ही नहीं है। जोशी ने कहा कि खबरों की प्रस्तुति में केवल खानापूर्ति हो रही है और काम की कोई बात सामने नहीं आ रही थी। टीआरपी रेटिंग की दौड़ में टीवी चैनलों में विषय सामग्री का अभाव हो गया है।

जाने माने पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा कि टीवी चैनलों पर लगभग 60 घंटे तक एक घटना रियलिटी शो में तब्दील हो गई। भारत पर हमला हुआ इस संदर्भ में सनसनीखेज तरीके से पेश किया गया। इसके महत्व और गंभीरता को शायद उस अर्थ में समझा नहीं जा रहा है।

राय ने कहा कि सेना और पुलिस किस वक्त क्या कर रही है उसका प्रसारण करने का क्या महत्व है। मुंबई ही नहीं पूरा देश दहशत में था और कमांडो कार्रवाई का लगातार प्रसारण किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि 9/11 के दौरान अमेरिकी मीडिया के परिदृश्य याद दिलाने की जरूरत नहीं है। उस दौरान अमेरिकी टेलीविजन पर केवल यह लिखा आता था वार आन अमेरिका।

वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे के अनुसार किसी भी घटना को पेश करने में मीडिया को परिपक्व भूमिका निभाने की जरूरत है, क्योंकि अंतत: आम आदमी से इसका सरोकार होता है। जाकिर नगर से लेकर अनेक आतंकी घटनाओं में मीडिया की भूमिका पर प्रश्न उठते रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके माता पिता उन्हें बताया करते थे कि 1946 से पहले किसी को भी इस बात का अंदेशा नहीं था कि भारत के टुकड़े हो जाएंगे। लेकिन घृणा और वैमनस्य के राक्षस ने अपना असर दिखाया और एक वर्ष बाद ही देश का विभाजन हो गया।

पांडे के अनुसार बदले जोड़तोड़ घृणा और विघटनकारी तत्व एक बार फिर सिर उठा रहे हैं और अपने लिए मौका ढूंढ रहे हैं। इस समय मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें इसके जाल में नहीं फंसना चाहिए।

एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि एक टीवी चैनल के पत्रकार जमीन पर लेट कर ऐसे रिपोर्टिग कर रहे थे मानो वह कोई युद्ध क्षेत्र हो। वह जरूरत से ज्यादा उत्साहित थे। युद्ध के समय में भी इस तरह से रिपोर्टिग नहीं की जाती है।

चैनलों ने हालांकि बाद में कहा था कि कमांडो कार्रवाई का सीधा प्रसारण नहीं करने के सरकार के अनुरोध को मानते हुए वे सीधी कार्यवाई नहीं दिखा रहे हैं।