Tuesday, February 24, 2009

एक लाख रुपये का हनुमान चालीसा !


क्या आपने एक लाख रुपये का हनुमान चालीसा देखा है? इन दिनों वाराणसी में चल रहे औद्योगिक मेले में एक लाख रुपये वाला एक हनुमान चालीसा को देखने के लिए बडी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं।

मेले में प्रदर्शन के लिए रखे गए एक वर्ग सेंटीमीटर के हनुमान चालीसा में 45पन्ने हैं, जिसमें हनुमान जी की तस्वीरें भी है। इस हनुमान चालीसा को गोरखपुर जिले के बसंतपुरगांव के निवासी राजकुमार वर्मा ने तैयार किया है।

वर्मा ने बताया कि उन्होंने सात महीने में इस चालीसा को तैयार किया। चालीसा का मूल्य 1,00000लाख रुपये तय करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसे तैयार करने में उन्हें काफी मेहनत करनी पडी है।

वर्मा के मुताबिक चालीसा में मौजूद हनुमान जी की 22तस्वीरों को भी उन्होंने ही तैयार किया। वैसे वर्मा को अभी तक हनुमान चालीसा का कोई खरीदारनहीं मिला है।


Tuesday, February 17, 2009

बाबा मैनूं फारेन बसा दो!


बाबा मैनूं फारेन बसा दो!




उत्तर अमेरिका हो, यूरोप या फिर आस्ट्रेलिया। दुनिया का कोई कोना पंजाब दे पुत्तर से अछूता नहीं। आखिर किसी का पूरा कुनबा ही विदेश में हो तो वहीं बसने की इच्छा जोर मारेगी ही। विदेश जाने की मुराद पूरी करने के लिए पंजाबी युवाओं ने एक नायाब तरीका खोज निकाला है। ये लोग जालंधर के तल्हान स्थित गुरुद्वारा संत बाबा निहाल सिंह जी शहीदां में हवाई जहाज का खिलौना चढ़ाते हैं और मन्नत मानते हैं कि वह उन्हें विदेश में बसा दें।

यह सिलसिला हाल ही में तब शुरू हुआ जब किसी ने बताया कि गुरुद्वारा में जहाज चढ़ाने से विदेश में बसने की इच्छा पूरी हो जाती है। नवांशहर से इसी तरह की मनौती मांगने आए संदीप सिंह कहते हैं कि मेरे दो दोस्तों ने यहां जहाज चढ़ाया था। अब वे विदेश में हैं। इसलिए मैं भी यहां जहाज चढ़ाने आया हूं। ब्रिटेन में रहने वाले जगजीत सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह अमेरिका जाना चाहते थे। उन्होंने तल्हान में जहाज चढ़ाया और कुछ ही दिनों बाद उन्हें अमेरिका का वीजा मिल गया। गुरुद्वारे के बाहर लगी दुकानों की भी चांदी है। रोज 150-200 रुपये वाले 15-20 जहाज चढ़ावे के लिए खरीदे जाते हैं। रविवार को यह संख्या 50 को भी पार कर जाती है। मजेदार बात तो यह कि मनौती उसी देश की एयरलाइंस का हवाई जहाज चढ़ाकर मानी जाती है जहां बसने की इच्छा है।

Wednesday, February 11, 2009

बहन की संवेदनशीलता


यह बात सुनने में थोडी अटपटी लग सकती है पर सच्चाई यह है कि लडकियां जन्मजात रूप से अति संवेदनशील और केअरिंग नेचर की होती हैं और उनकी इसी स्वभावगत विशेषता के कारण कोई भी लडका अपने किसी भाई की तुलना में बहन को ज्यादा पसंद करता है। घर के कामकाज में रुचि लेना, परिवार के सभी सदस्यों का खयाल रखना आम तौर पर हर लडकी की आदत में शुमार होता है। मिसाल के तौर पर अगर घर में एक भाई बीमार होता है तो दूसरा भाई ज्यादा से ज्यादा उसकी तबीयत के बारे में उससे पूछता है, फिर अपने आप में व्यस्त हो जाता है। लेकिन जब बहन को यह बात मालूम होती है तो उसी वक्त सब कुछ भूलकर वह भाई की देखभाल में जुट जाती है। भाई की छोटी-सी परेशानी में भी वह खुद परेशान हो उठती है। उसकी लंबी आयु, अच्छी सेहत और सफल करियर के लिए हमेशा ईश्वर से प्रार्थना करती रहती है। सबसे बडी बात यह है कि बहन के साथ भाई की प्रत्यक्ष प्रतिस्पद्र्धा नहीं होती और न ही उनके हितों का आपस में टकराव होता है क्योंकि दोनों के जीवन की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफी हद तक अलग होती हैं।

भले ही भारतीय समाज पहले की तुलना में बहुत बदल गया है फिर भी भाई के मन में यह बात जरूर छिपी होती है कि अपनी बहन के साथ मुझे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहना, शादी के बाद उसका एक अलग ही घर-संसार होगा। फिर जिसके साथ थोडे ही समय के लिए रहना है, उससे झगडा कैसा? इस वजह से भाई के मन में अपनी बहन के प्रति कहीं न कहीं अतिरिक्त स्नेह की भावना जरूर होती है। साथ ही लडकियों की स्वभावगत संवेदनशीलता भाई के साथ उनके स्नेह भरे नाते को और भी ज्यादा मजबूत बनाती है।

Thursday, February 5, 2009

परिवार को जोड़ता वास्तु


परिवार के सभी सदस्यों के बीच प्रेमपूर्ण संबंध बनाए रखने में वास्तु का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए प्राचीनकाल से ही अपने घर को व्यवस्थित करते समय वास्तु के सिद्धांतों पर अमल करने की सलाह दी जाती है। हालांकि आधुनिक युग में छोटे फ्लैट्स में वास्तु के सभी सिद्धांतों का पूरी तरह पालन कर पाना संभव नहीं होता। फिर भी आप चाहें तो इसके कुछ आसान उपायों को अपनाकर अपने परिवार को खुशहाल बना सकते हैं :

1. यदि आपका मकान केवल एक ही मंजिल वाला हो या फिर आप किसी अपार्टमेंट के फ्लैट में रहते हैं तो उसके दक्षिण-पश्चिमी, पश्चिमी या फिर दक्षिणी भाग में बुजुर्गो जैसे-दादा-दादी या फिर माता-पिता का कमरा होना चाहिए। जबकि बच्चों के लिए सभी दिशाएं उपयुक्त हैं।

2. परिवार के सभी सदस्यों के बेडरूम में प्राकृतिक प्रकाश की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसा तभी संभव होता है, जब पूरे मकान के चारों ओर खुली जगह हो। यदि प्रकाश की ज्यादा व्यवस्था न हो पाए तो खिडकी के साथ रोशनदान जरूर बनवाएं। प्राकृतिक प्रकाश से व्यक्ति में सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है और परिवार के सदस्यों के बीच वैमनस्य की भावना नहीं पनपती।

3. पूजा-पाठ, जप-तप, कथा-प्रवचन, योग एवं ऐसे ही अन्य धार्मिक कार्यो के लिए यूं तो पूर्व दिशा सर्वोत्तम है। फिर भी पूर्वोत्तर दिशा ऐसे सभी कार्यो के लिए उत्तम है।

4. हर महीने में एक बार कम से कम एक दिन ऐसा जरूर निकालें कि जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर धार्मिक क्रियाकलाप जैसे हवन, यज्ञ, कथा आदि करें। इससे न केवल घर की शुद्धि होती है बल्कि ऐसा करने से परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक लगाव भी बढता है।

5. यदि आपके मकान में एक से अधिकमंजिलें हैं तो आयु में बडे सदस्यों को ऊपरी एवं छोटे सदस्यों को निचली मंजिल पर रहना चाहिए। अर्थात बडों के पांव के नीचे के भाग में छोटे सदस्य रहें तो उत्तम है।

6. अगर परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को सीढियां उतरने-चढने में कठिनाई महसूस हो तो ऐसी स्थिति में बुजुर्गो का बेड ऊपरी मंजिल पर रहने वाले बच्चों या युवाओं के बेड के बिलकुल ऊपर न होकर थोडा दाएं या बाएं होना चाहिए।

7. पूरे परिवार की एकजुटता के लिए यह भी ध्यान रखें कि आपका डाइनिंग रूम मकान के पूर्व, उत्तर या दक्षिण-पूर्व दिशाओं में हो।

8. भोजन करते समय परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रहे और बाकी सदस्य दक्षिण छोडकर किसी भी दिशा की ओर मुख करके बैठ सकते हैं।

9. लंच या डिनर के समय परिवार के सभी सदस्यों को टीवी देखने के बजाय आपस में प्रसन्नतापूर्वक बातचीत करनी चाहिए। किसी भी कटु विषय पर बातचीत नहीं करनी चाहिए।

10. पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित कमरे में रहने वाली अविवाहित लडकी का विवाह यथाशीघ्र अच्छे घर में हो जाता है और वह शादीशुदा जीवन में भी सुखी रहती है।

11. बच्चों के रहने का कमरा पूर्व, पश्चिम या पूर्वोत्तर के साथ लगती दिशाओं में रखें। छोटे बच्चों की प्रतिभा एवं योग्यता में वृद्धि करने के लिए पढाई का कमरा पूर्व, पूर्वोत्तर या फिर उत्तर दिशाओं में व्यवस्थित करें। विद्यार्थी उसी कमरे में पूर्व, पूर्वोत्तर या फिर उत्तर दिशाओं में मुख करके पढें तो अच्छा रहेगा।

12. पश्चिम एवं उत्तर दिशा में स्थित वायव्य कोण में बने कमरे का यदि ड्राइंगरूम या गेस्टरूम के रूप में प्रयोग करें तो मेहमानों को वहां रहना तो अच्छा लगेगा ही, साथ ही वे आपके प्रशंसक भी बनेंगे।

यदि परिवार के सभी सदस्य वास्तुशास्त्र के इन सिद्धांतों का पालन करें तो इससे वातावरण सौहार्दपूर्ण बना रहेगा।

Monday, February 2, 2009

ढाई सौ बरस बाद जलेगी होली



इस बार गांव खरावड़ में होली जलेगी ढाई सौ बरस बाद। हरियाणा के इस गांव में लड़ते-लड़ते दो सांड़ जलती होलिका में गिर गए थे और उनकी मौत हो गई थी। तब से इस गांव में होली जलाने की परंपरा बंद थी। शनिवार यानी वसंत पंचमी पर गांव वालों ने होलिका के लिए लकड़ियां रखने की शुरुआत कर दी है।

गांव खरावड़ रोहतक जिले में पड़ता है। यहां के बुजुर्ग अपने बुर्जगों से सुनी कहानी के आधार पर बताते हैं-'करीब ढाई सौ वर्ष पहले की बात है। गांव में होलिका दहन हो रहा था तभी लड़ते-लड़ते दो सांड़ उसमें जा घुसे थे। ग्रामीणों ने अपने स्तर पर उन्हे बचाने का प्रयास भी किया। लेकिन कामयाब नहीं हुए। इस हादसे ने ग्रामीणों की रूह को कपा दिया। गांव के बुजुर्गो ने पंचायत में निर्णय लिया कि जब तक होली वाले दिन गांव में कोई गाय बछड़े को जन्म नहीं देती तब तक होलिका दहन नहीं किया जाएगा।

इस फैसले का पिछले साल तक निर्वाह किया गांव वालों ने। लोग पास-पड़ोस के गांवों में होलिका दहन देखने जाते थे। लेकिन गत वर्ष होली के दिन गांव के राजेंद्र के यहां गाय ने बछड़े को जन्म दिया। उसी दिन सरपंच के नेतृत्व में गांव के लोगों की पंचायत हुई। इसमें निर्णय लिया गया कि अगले वर्ष होलिका दहन किया जाएगा और बछड़े को दाग लगाकर गांव में छोड़ दिया जाएगा। इसके लिए गाय मालिक ने भी अपनी सहमति दे दी थी। गांव के सरपंच उमेद मलिक ने बताया कि इस बार गाजे-बाजे के साथ होलिका दहन किया जाएगा।

ग्रामीण अनूप सिंह, जगवीर नंबरदार, सुभाचंद, रणधीर, धर्मवीर, फूलकुंवार, सालू, राकेश, रणबीर मलिक, बंटा, अनिल आदि ने बताया कि गांव में होली दहन नहीं होने से उनके अंदर त्यौहार न मनाने की टीस बनी रहती थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने जन्म में आज तक होलिका दहन नहीं देखा है।

वे राम के बंदे हैं और रहीम के भी


वे राम के बंदे हैं और रहीम के भी। ईश्वर और अल्लाह उनकेलिए एक ही हैं। नियमित नमाज अदा करते हैं तो राम चरित मानस के दोहे भी कंठस्थ हैं। उनका मानना है कि श्रद्धा-आस्था को हिंदू और मुसलमान में विभाजित नहीं किया जा सकता और अपनी इसी भावना के साथ मिर्जापुर के इस्लाम भाई यहा के माघ मेला में मानस पाठ कर रहे हैं।

उनका जिक्र चलने पर अहिल्या आश्रम शिविर के बाबा तुलसीदास कहते हैं- कौन कहता है कि सरस्वती की धारा लुप्त हो गई है। इस्लाम यहा अपनी जुबान से सरस्वती की धारा ही तो बहा रहे हैं, जिसका गंगा और जमुना से संगम हो रहा है।

प्रयाग के पड़ोसी जिले मिर्जापुर के पहाड़ी ब्लाक के धर्मदेवा गाव के निवासी हैं मोहम्मद इस्लाम। महावीर मार्ग पर स्थित अहिल्या आश्रम के शिविर में मानस पाठ के लिए उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है। उन्हें मानस वेत्ता माना जाता है और अब तक वे दो हजार से अधिक बार रामायण पाठ कर चुके हैं। सुंदरकाड तो उन्हें जुबानी याद है।

इस्लाम बताते हैं- पिछले 18 साल से मैं मानस पाठ कर रहा हूं। जिस वक्त मुंह से मंगल भवन अमंगल हारी निकलता है। लगता है कि मैं विश्व कल्याण के काम में जुटा हुआ हूं। रामचरित मानस की ओर इस्लाम का रुझान अचानक ही हुआ। पहले वह मुंबई में सिलाई का कार्य करते थे। वहा मामला जमा नहीं तो वापस गाव आ गए। एक दिन वह गाव में ही कीर्तन-पाठ कार्यक्रम में शरीक हुए तो काफी आनंद आया। घर में रामायण खरीद लाए और कई बार अध्ययन किया। इसके बाद तो वह जहा भी अखंड रामायण का कार्यक्रम होता वहा चले जाते। कुछ ही दिनों बाद उन्हें रामायण और सुंदर काड कंठस्थ हो गया। देखते ही देखते ढोल-मजीरा के साथ उनकी अंगुलिया हारमोनियम पर भी सध गई। असीम आनंद पाकर वह इसी में रमते चले गए। बताते हैं कि इसके लिए उन्हें दूर-दूर से बुलावा आता है। अब तक वह 2230 बार अखंड रामायण का पाठ कर चुके हैं।

यह पूछे जाने पर कि कट्टरपंथियों को इस पर आपत्ति नहीं, वे कहते हैं- बस आप में मजबूती हो। यही बड़ी बात है। फिर कोई भी मुझसे बहस कर ले। नियम से नमाज पढ़ता हूं। कुरान की आयतें कंठस्थ हैं। बताते हैं कि वह आस पास के गावों में युवाओं को मजहबी पाठ पढ़ाने के लिए शिविर भी आयोजित कर चुके हैं। इसके अलावा गाजीपुर में कुछ साल पहले हुए दंगे के दौरान पुलिस और प्रशासन ने उन्हें बुलाया भी था।

Wednesday, January 28, 2009

आस्था का उत्सव पुष्कर मेला





राजस्थान को महलों, किलों और हवेलियों की धरती होने के साथ-साथ मेलों और उत्सवों की धरती होने का गौरव भी हासिल है। मरुभूमि के इस अंचल को प्रकृति ने भले ही चटख रंगों से नहीं संवारा, लेकिन मरुवासियों ने इसे अपनी संस्कृति के रंगों से ऐसा सजा लिया है कि दुनिया देखते नहीं थकती है। इन रंगों की छटा यहां के मेलों और उत्सवों में नजर आती है। लोक के ऐसे ही रंगों से सजा एक शानदार आयोजन है पुष्कर मेला। जैसा कि नाम से ही विदित होता है, यह मेला राजस्थान की मंदिर नगरी पुष्कर से जुडा है। वैसे तो वर्ष भर पुष्कर में तीर्थयात्रियों और पर्यटकों का आना-जाना बना रहता है। लेकिन पुष्कर मेले के दौरान इस नगरी में आस्था और उल्लास का अनोखा संगम देखा जाता है। पुष्कर को इस क्षेत्र में तीर्थराज कहा जाता है और पुष्कर मेला राजस्थान का सबसे बडा मेला माना जाता है। पुष्कर मेले की प्रसिद्धि का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि ऐतिहासिक धरोहरों के रूप में ताजमहल का जो दर्जा विदेशी सैलानियों की नजर में है, ठीक वही महत्व त्योहारों से जुडे पारंपरिक मेलों में पुष्कर मेले का है।

पुष्प से बना पुष्कर

पुष्कर को इस क्षेत्र में तीर्थराज कहे जाने का गौरव इसलिए प्राप्त है क्योंकि यहां समूचे ब्रह्मांड केरचयिता माने जाने वाले ब्रह्मा जी का निवास है। पुष्कर के महत्व का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है। इसके अनुसार एक समय ब्रह्मा जी को यज्ञ करना था। उसके लिए उपयुक्त स्थान का चयन करने के लिए उन्होंने धरा पर अपने हाथ से एक कमल पुष्प गिराया। वह पुष्प अरावली पहाडियों के मध्य गिरा और लुढकते हुए दो स्थानों को स्पर्श करने के बाद तीसरे स्थान पर ठहर गया। जिन तीन स्थानों को पुष्प ने धरा को स्पर्श किया, वहां जलधारा फूट पडी और पवित्र सरोवर बन गए। सरोवरों की रचना एक पुष्प से हुई, इसलिए इन्हें पुष्कर कहा गया। प्रथम सरोवर कनिष्ठ पुष्कर, द्वितीय सरोवर मध्यम पुष्कर कहलाया। जहां पुष्प ने विराम लिया वहां एक सरोवर बना, जिसे ज्येष्ठ पुष्कर कहा गया। ज्येष्ठ पुष्कर ही आज पुष्कर के नाम से विख्यात है।

कालांतर में वह प्राचीन मंदिर आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था। सन् 1809 में सिंधिया के एक मंत्री गोकुल चंद पारेख ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। वैसे अब अन्य कई स्थानों पर मंदिरों में ब्रह्मा जी की एकल प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाने लगी है, अन्यथा उनकी प्रतिमा हर स्थान पर त्रिमूर्ति के रूप में ही विद्यमान होती थी। ब्रह्मा मंदिर के अलावा यहां महादेव मंदिर, वाराह मंदिर, रंग जी मंदिर और वैकुंठ मंदिर प्रमुख हैं। पुष्कर में मंदिरों की कुल संख्या लगभग चार सौ है। इसीलिए इसे मंदिर नगरी भी कहा जाताहै।


और लगने लगा मेला

समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढती गई। तब न जाने कब आस्था के साथ आमोद-प्रमोद और अनुरंजन के भाव जुड गए और पर्व ने एक लोकोत्सव अर्थात मेले का रूप ले लिया। पहले वस्तु विनिमय की परंपरा थी। इसलिए यह मेला जीवन की आवश्यक वस्तुओं के विनिमय का बहुत बडा केंद्र भी बन गया। किसानों के जीवन में मवेशियों का विशेष स्थान होता है। अत: यहां मवेशियों का क्रय-विक्रय भी शुरू हो गया। उसके साथ ही मेले का आकार बढता गया। आज भी इस मेले ने अपना सदियों पुराना विशिष्ट ग्रामीण और बहुरंगी चरित्र बनाए रखा है। इससे प्रभावित हो लाखों की संख्या में लोग यहां आते हैं। पुष्कर नगरी में हर वर्ष कार्तिक माह में भव्य मेला लगता है। इस विश्वप्रसिद्ध मेले में पांच लाख से अधिक श्रद्धालु, ग्रामवासी, पशुपालक और देश-विदेश के सैलानी शिरकत करते हैं। पर्यटकों के बढते आकर्षण को देख राज्य के पर्यटन विभाग ने इसके साथ कई रोचक गतिविधियां भी जोड दी हैं। वैसे तो यह मेला पूर्णिमा से एक माह पूर्व ही भरना शुरू हो जाता है। लेकिन प्रमुख गतिविधियां एकादशी से पूर्णिमा तक होती हैं। मेला स्थल के व्यापक विस्तार में हजारों मवेशी, स्थानीय व्यापारियों की सैकडों गुमटियां, ऊंटगाडियां और डेरा डाले राजस्थानी परिवारों के पारंपरिक वेशभूषा में घूमते हजारों स्त्री-पुरुष मेले के दृश्य का खास हिस्सा होतहैं।


पशुओं के करतब

किसी भी मेले को फोटोजेनिक स्वरूप प्रदान करने वाले विशालकाय चक्करदार झूले, लकडी के हिंडोले, चरखियों आदि का इस मेले में होना लाजिमी है। काला जादू के शो और मौत का कुआं जैसे करतब दिखाने वाले घुमंतू सर्कस भी पुष्कर मेले में स्थानीय लोगों के लिए बडा आकर्षण होते हैं। लेकिन सबसे बडा आकर्षण आज भी यहां का पशु मेला ही होता है। जिसमें लोग मेवती, नागौरी, गिर जैसे बढिया नस्लों के ऊंटों के अलावा घोडे, गधे और बैल खरीदने आते हैं। बिहार में सोनपुर मेले के बाद पुष्कर मेले को दुनिया का दूसरा सबसे बडा पशुमेला कहा जाता है। लेकिन अगर केवल ऊंटों की खरीद-फरोख्त की बात करें तो पुष्कर मेले को सबसे बडा कैमल फेयर कहा जाता है। यहां लगभग 35 हजार सजे-धजे ऊंट मेले का हिस्सा होते हैं। ऊंटों के झुंड जगह-जगह नजर आते हैं, जबकि कुल मवेशियों की तादाद साठ हजार के लगभग होती है। किसी मेले में इतने सारे पशु और पशुपालक मौजूद हों तो पशुओं के करतब भी अवश्य देखने को मिलेंगे। तभी तो मेले में सैलानियों को ऊंट, घोडों और बैलों की दौड का आयोजन भी देखने को मिलता है। प्रशिक्षित ऊंटों की कुछ और स्पर्धाएं भी उन्हें आकर्षित करती हैं। वैसे पुष्कर मेले में रंग-बिरंगी वेशभूषा में घूमते राजस्थानी लोग भी मेले को अनोखी सुंदरता प्रदान करते हैं। लहंगा-चुनरी के साथ पारंपरिक आभूषण पहने औरतें और चटख रंगों की पगडी पहने, बडी-बडी मूछें धरे पुरुष राजस्थान की संस्कृति का ही एक रंग दर्शाते हैं। विदेशी सैलानी तो राजस्थानी जीवनशैली की इस छवि को अपने कैमरों में कैद करते नहीं थकते।

मेले में घूमते हुए मार्ग के दोनों ओर छोटी-बडी गुमटियों की कतार नजर आती है। इन अस्थायी दुकानों में मोतियों की माला, लाख की चूडियां, पारंपरिक आभूषण, डिजाइनदार जूतियां, चुनरी, छापे की ओढनी, बंधेज के परिधान या रंग-बिरंगी पगडियां देख कर आपका मन भी इन्हें खरीदने को मचल उठेगा। हस्तशिल्प और कपडों की दुकानों से भी यहां काफी कुछ खरीदारी की जा सकती है। पुष्कर मेले की इंद्रधनुषी छटा पर्यटकों को इस तरह प्रभावित करती है कि उन्हें शाम होने का पता ही नहीं चलता।